ईश्वर का संसार

ईश्वर के पास मन नहीं होता है। ईश्वर का अर्थ “केन्द्र” या “भूमा” से है। यदि इसमें मन होता, तो इस पर भी कर्म का सिद्धांत लागू हो जाता और वह भी हमारी भाँति संसार में होता। मन एक औजार अवश्य है जो “उसने” हमको दिया है। इसका एक भाग हमारे पास है और दूसरा “उसके” निकट है। हमारा रुख दोनों ओर है। एक भाग से हम लौकिक कार्य करते हैं और दूसरे से पारलौकिक।जब हम अपने निकट वाले मन को उसके निकट वाले सिरे से सम्बद्ध कर देते हैं तो सम्पूर्ण में एक ही धारा प्रवाहित हो जाती है ;और इसी के अभ्यास की आवश्यकता है, ताकि जो खटक उसके निकट वाले भाग में है, वही खटक हमारे निकट वाले भाग अर्थात् मन में उत्पन्न हो जाय।
एक रहस्य की बात मैं बतलाता हूँ।हम भक्ति -भाव में बहुधा यह कहते चले आये हैं कि “बिना ईश्वर की इच्छा के एक पत्ती भी नहीं हिलती”; और यह सच भी है। परन्तु यदि मैं यह कह दूँ कि बिना भक्त के इच्छा के ईश्वर भी नहीं हिलता,तो नहीं मालूम, महात्मा लोग मेरे बारे में क्या विचार करेंगे। परन्तु बात वास्तव में यही है,और सत्य बात कहनी ही चाहिए ताकि वास्तविकता सबके सामने प्रकट हो जावे।
सर्वोत्कृस्ट अति-चेतना की स्थिति (Highest type of Super-conscious State) में ध्यानपूर्वक देखने से यह ज्ञात हुआ है कि संसार की रचना में एक लाख बीस हजार वर्ष लगे है। यद्यपि भूमा के नीचे, जो शक्ति का क्षेत्र है,उसमें केवल एक ही झटका लगा था, परंतु उसका प्रभाव प्रकट होते-होते और रचना की सामग्री एकत्र होते-होते उपर्युक्त समय लग गया।
केन्द्र के चारों ओर एक वृत्त है, जो हद है और जिससे पार होना असंभव है। हाँ,यदि कोई महान शक्ति-संपन्न व्यक्ति हो तो वह कदाचित् कुछ सेकंड के लिए उसमें उचक कर झाँक सके।यदि इस वृत्त के चारों ओर अपनी इच्छा-शक्ति से एक सजीव विचार विश्व के समाप्त करने का बाँध दे और उसकी धाराओं को केन्द्रीय-मण्डल में संकलित कर दे तो वही चीज केन्द्र की शक्ति से मिलकर स्पन्दन पैदा कर देगी और फिर उसकी परिवृद्धि होने से वही शक्ति नीचे को उतरना आरम्भ हो जाएगी। अब जितना वेग इसमें पैदा कर दिया जाएगा उतनी ही तेजी से यह चीज बढ़ेगी ।
जब यह हाल है तो दिव्य दृष्टि या आंतरिक दृष्टि के विस्तार का कोई अनुमान नहीं कर सकता। यद्यपि मैंने सब कुछ कह दिया फिर भी उसकी व्याख्या बहुत बचते-बचते की है। यदि कोई व्यक्ति इस सीमा तक उन्नति कर चुका हो और वह प्रकृति में कोई विशेष परिवर्तन चाहता हो तो उसकी विधि बहुत सरल है। यह असंभव है कि वह इसमें सफल न हो ; उसके लिए हर एक बात संभव है। उसका उपाय यह है कि अपनी उस असल दशा में अपने खयाल को इस प्रकार बाँध दे कि जिसमें शब्द गायब हों और एक खयाली चीज उनके अभिप्राय को व्यक्त करे तो वही चीज इन काम को करने के लिए उद्धत हो जाएगी, और वही ईश्वरीय आज्ञा होगी। परन्तु केवल उस समय जबकि,जैसा ऊपर वर्णित है, भूमा से ऐसा संबंध हो जाए कि उसका वही अंदाज उत्पन्न हो जाय, तो जो चीज उसमें उत्पन्न की जाएगी, उसका भी वही अंदाज बनने लगेगा।उदाहरण के लिए यदि एक तार के सिरे पर झंकार दी जाए तो कुल तार में वही झंकार या स्पंदन उत्पन्न हो जाएगी।
बन्दे की पहुँच जब इस सीमा तक हो जाती है तो बन्दगी तो कायम रहती है परन्तु वह बन्दा नहीं रहता ।यह उसकी सैाजन्यता है कि जिस संबंध ने उसको यहाँ तक पहुँचाया है ,उसका हृदय इस संबंध से अलग नहीं होता। इसी के अनुसार आज्ञायें भी वह इसी तरह प्राप्त करता है जिनकी संसार में आवश्यकता है। उनका निजी स्वार्थ कुछ नहीं रह जाता। वह एक प्रकार से भूमा का अंश हो जाता है।
यह दशा किसी के भाग में नहीं आती, सिवाए ऐसे अवसर पर जबकि नियति संसार में परिवर्तन चाहती है। इस कोटि की सत्तायें एक समय में दो कभी नहीं हो सकती। समस्त ब्रह्मांड में एक ही समय में, एक ही सत्ता ऐसी हो सकती है और वह भी जब प्रकृति को आवश्यकता होती हैं।
यह तो भाई,ज्ञान की अंतिम सीमा मैं ने बतला दी ।यदि इसकी अभिव्यक्ति शब्दों में की जावे तो इसके लिए “ज्ञान” उचित शब्द न होगा। इस सीमा तक अभ्यासियों को पहुँचने का प्रयत्न करना चाहिए। संभव है कि इसके आगे कुछ और ज्ञात हो जावे। यह संकेत भविष्य में आने वाले लोगों के लिए है, और जो लोग वर्तमान काल में हैं, वे भी इस पर विचार करें।

विलुप्त सरस्वती नदी

वर दे वीणावादिनी, वर दे !
हमारी प्राचीन आर्य सभ्यता और संस्कृति का केंद्र उत्तर और उत्तर-पश्चिम भारत हुआ करता था। आज की विलुप्त सरस्वती नदी तब इस क्षेत्र की मुख्य नदी थी। तत्कालीन आर्य-सभ्यता के सारे गढ़, नगर और व्यावसायिक केंद्र सरस्वती के किनारे बसे थे। सरस्वती के रास्ते ही दुनिया के दूसरे हिस्सों से व्यापार होता था। तमाम शिक्षण संस्थाएं, ऋषियों और आचार्यों के आश्रम सरस्वती के तट पर स्थित थे। ये आश्रम अध्यात्म, धर्म, संगीत और विज्ञान की शिक्षा और अनुसंधान के केंद्र थे। वेदों, उपनिषदों और अनेक स्मृति-ग्रंथों की रचना इन्हीं आश्रमों में हुई थी। सरस्वती को ज्ञान के लिए उर्वर अत्यंत पवित्र नदी माना जाता था। ऋग्वेद में नदी के रूप में इस नदी के प्रति श्रद्धा-निवेदन किया गया है। ऋग्वेद के एक सूक्त के अनुसार – ‘प्रवाहित होकर सरस्वती ने जलराशि ही उत्पन्न नहीं की, समस्त ज्ञानों का भी जागरण किया है।’ कई हजार साल पहले सरस्वती में आई प्रलयंकर बाढ़ और विनाश-लीला से अधिकांश नगर और आश्रम जब नष्ट हुए तो आर्य सभ्यता गंगा और जमुना के किनारों पर स्थानांतरित हो गई। इस विराट पलायन के बाद भी जनमानस में सरस्वती की पवित्र स्मृतियां बची रहीं। प्रकृति की कल्याणकारी शक्तियों पर देवत्व आरोपित करने की हमारी सांस्कृतिक परंपरा के अनुरूप कालान्तर में ब्राह्मण ग्रंथों और पुराणों में सरस्वती को देवी का दर्जा दिया गया। पुराणों के अनुसार ब्रह्मा ने जब सृष्टि की रचना की तो हर तरफ मौन पसरा हुआ था। ब्रह्मा की सघन तपस्या से वृक्षों के बीच से एक अद्भुत चतुर्भुजी स्त्री प्रकट हुई जिसके हाथों में वीणा, पुस्तक, माला और वर-मुद्रा थी। जैसे ही उस स्त्री ने वीणा का नाद किया, संसार के समस्त जीव-जन्तुओं को वाणी, जलधारा को कोलाहल और हवा को सरसराहट मिल गई। ब्रह्मा ने उसे वाणी की देवी सरस्वती कहा। शारदा, शतरूपा, वीणावादिनी, वीणापाणि, वेद स्मृति, वाग्देवी, वागेश्वरी और वेदवती सरस्वती के कुछ अन्य नाम हैं। वसंत पंचमी का दिन हम देवी सरस्वती के जन्मोत्सव के रूप में मनाते हैं। सरस्वती की पूजा वस्तुतः आर्य सभ्यता-संस्कृति, ज्ञान-विज्ञान, गीत-संगीत और धर्म-अध्यात्म के कई क्षेत्रों में विलुप्त सरस्वती नदी की भूमिका के प्रति हमारी कृतज्ञता की प्रतीकात्मक अभिव्यक्ति है।