शास्वत संदेश

प्रनवउं पवन कुमार खलवन पावक ज्ञान घन
जासु हृदय आगार बसंहि राम सरचाप धर

सावधान
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संसार का प्रत्येक प्राणी अषांत एवं दुःखी क्यों और कैसे है?
प्रश्न 1. इस समय विष्व का हर व्यक्ति एवं राष्ट्र अषान्त एवं दुःखी क्यों है ? सब साधन सम्पन्न होते हुए भी विष्व के सभी राष्ट्र असुरक्षित अषान्त विपरीत समस्याओं से ग्रसित क्यों है ? इसके क्या क्या कारण हो सकते है ?

उत्तर इन सभी समस्याओं का सही समाधान ढूंढने के लिए इसके मूल कारणों पर विचार करना होगा । सृष्टि(संसार) कैसे बनी है, इसके संचालन के क्या क्या नियम, मापदण्ड है । बिना नियम मापदण्डों के न तो कोई चीज बनती है ना ही उसका संचालन होता है । इन्हीं नियमों में गलतियां हुई है जिनके कारण आज प्रत्येक राष्ट्र, शहर गांव, मौहल्ला, गली, परिवार, मानव अषान्त एवं दुःखी है ।

प्रश्न 2. सृष्टि(संसार) कैसे बनी है, कैसे संचालन होता है, उसके क्या नियम, मापदण्ड है और कहां-कहां गल्तियां हुई है, जिसके कारण दिनों दिन विपरीत समस्याएं बढ़चढ कर पैदा हो रही है । अषान्ति, अराजकता, असहिष्णुता और दुःख बढ़ते जा रहे है जबकि मानव शरीर अति दुर्लभ है फिर भी मानव सबसे ज्यादा दुःखी है ।

उत्तर ध्यान से समझिए, सृष्टि(संसार) (3+5=8) मूल में आठ तत्वों से बनी है (इस बात को सभी धर्माचार्यो ने अलग-अलग नामों से माना है फिर 8+16+84=108 कुल मुख्य तत्व है । इसके समझने के लिए ही पूर्वकाल के वेज्ञानिकों (ऋर्षि महर्षियों) ने माला के 108 मनके बनाये है । उसके बाद अलग-अलग कार्यो के लिए इसमें इनके उपतत्व बनकर जुड़ते जाते है और संसार के कार्य (उत्पति, पालन, संहार) चल रहे है । प्रथम मुख्य 3+5=8 तत्व हैं, महापुरुषों ने अथक प्रयास (तपस्या) करके, खोज करके मानव एवं प्राणीमात्र सुख शांति का जीवन कैसे व्यतीत करें, उसका सार शास्त्रों सद्ग्रन्थों के माध्यम से प्राणी मात्र के सुख के लिए बताया है। उन नियमों का सही रूप से पालन करने पर ही कोई भी व्यक्ति दुःख व अषान्ति का निराकरण कर सकता है । गत हजारों वर्षो से इन नियमों में गल्तियां होनी आरम्भ हो गई थी जो आज 95 प्रतिषत से 99 प्रतिषत तक हो गई है । इसी कारण आज सर्वत्र अषान्ति अराजकता, अकाल, प्राकृतिक, प्रकोप आदि व शारीरिक मानसिक दुःख और विपरीत परिस्थितियां दिनों दिन बढ़ती जा रही है । इन्हीं आठ तत्वों को अष्टघा प्रकृति के नाम से एवं दूसरी जगह दूसरे नामों से कहा गया है ।

उदाहरणार्थ – भगवान् कृष्ण की आठ पटरानियां भी अष्टघा प्रकृति ही है । योग में अष्टांग योग महाराजा दषरथ की आठ पटरानियां आदि अनेक जगह अलग-अलग नामों से कहा है ।

चित्र नं. 1 इन सबका संचालक पूर्ण ब्रह्म इन सबसे अलग है ।

तीन चेतन तत्व
1 ब्रह्मा अ अकार रजोगुण उत्पतिकर्ता छ नगेटिव न्यूट्रोन ळ जनरेट
2 विष्णु उ उकार सतोगुण पालनकर्ता च् पोजेटिव प्रोटोन व् ओर्गनाइज
3 महेष म मकार तमोगुण संहारकर्ता म् अर्थ इलेक्ट्रान क् डिस्ट्राय

पांच जड़ तत्व यह है:-
4 आकाश तत्व से शब्द इष्ट देवता सर्वत्र व्यापक संरक्षक
5 वायु तत्व से स्पर्स ग्राम देवता ग्राम शहर के निवासियों के संरक्षक
6 अग्नि तत्व से रुप स्थान देवता (वास्तु) व्यक्ति के निवास स्थान के संरक्षक
7 जल तत्व से रस कुलदेवता कुल के संरक्षक
8 पृथ्वी तत्व से गंध पितृदेवता परिवार के संरक्षक

ये प्रकृति के 3$5त्र8 तत्व है सारे ब्रह्माण्ड (संसार) की उत्पत्ति पालन, संहार का आधार ये आठ तत्व ही है । इनको अलग-अलग जगह पर अलग-अलग नामों से कहा जाता है ।

उपर्युक्त तीन तत्व तो चेतना शक्ति (जीव, आत्मा, परमात्मा आदि) के मुख्य सूत्र है ये तीनो साथ ही रहते है, कभी किसी की, कभी किसी की प्रधानता रहती है परन्तु सब एक साथ रहते है, अलग नहीं होते ।

नीचे के पांच तत्व है जो जड़ शक्ति के मुख्य सूत्र है ये भी हमेषा एक साथ ही रहते है कभी अलग नहीं होते है इनका पंचीकरण है ।

यह तीन और पांच तत्व जब आपस में मिलते है तभी इनमें क्रिया शीलता आती है। इनके मिलने पर जन्म होता है, बिछुड़ने पर मृत्यु होती है। ‘‘इसी को जन्म एवं मृत्यु कहते है । मिलना और बिछुड़ना प्रकृति के हाथों में है । इसको सभी धर्माचार्यो ने अलग-अलग नामों से कहा है ।

पांच तत्वों को पांच कोषों के नाम से भी कहा जाता है । इन आठों तत्वों में से एक भी चीज अपनी जगह से हट जावे या काम करना बंद करदे तो आठों तत्व ही (-) हो जाते है ।

1. अन्नमयकोष,
2. प्राणमय कोष,
3. मनोमय कोष,
4. विज्ञानमय कोष,
5. आनन्दमय कोष
जीवों की उत्पत्ति, पालन संहार इनके नियम क्रमानुसार होता रहता है इसी का नाम सृष्टि(संसार) है।

नियमों को सही समझने पर वास्तविकता का अनुभव हो जाता है । दो तत्व पांच जड़ तत्वों की परिधी के केन्द्र (नाभी) में स्थापित है एवं तीसरा म् तत्व पांचों की परिधी के बाहर है इसलिए इसकी विस्फोटक(विनाषक) स्थिति है, अगर तीसरा म् तत्व भी केन्द्र (नाभी) में चला जाय तो इसकी विनाषक शक्ति खत्म हो जाती है और यही विज्ञान विनाषक न होकर पोषक बन जाता है जैसा कि चित्र नं. 3 में है चित्र नं. 2 में तीनों का जो क्रम बताया है जो छच्म् है वो ही अ$उ$मत्र? है । चित्र नं. 2 के नियमों (सिद्धान्तों) से जो साधक (वैज्ञानिक) साधना, खोज (अनुसंधान) करता है उस अनुसंधान करने वाले वैज्ञानिकों को ब्रह्माण्ड की असंख्य वस्तुओं में कुछ का तो अनुसंधान हो जाता है किन्तु इस सिद्धान्त से वैज्ञानिक को अपना पता नहीं चल सकता है कि ‘‘मैं कौन हूं’’ क्योंकि जिस तत्व के मिलने से इस बात का पता चलता है वो तत्व परीधी के बाहर है । चित्र नं. 3 के सिद्धान्त से जो साधक साधना करता है उसको मै कौन हूं’’ तथा सृष्टि(संसार) क्या है एवं पदार्थो का भी अनुसंधान हो सकता है । यही इन दोनो सिद्धान्तों का अन्तर है ।

नीचे के पांच तत्वों को ऋषियों, महर्षियों (अध्यात्मिक वैज्ञानिकों) ने पांच देवताओं के रूप में दर्षाया है इस बात को सभी धर्मो के आचार्यो ने अलग-अलग नाम रूपों में बताया है । पांच में से तीन को मूर्ति (स्वरूप) के रूप में कहा है । इन पांचो देवताओं को जो सही रूपों मे पूजकर संतुष्ट करता रहेगा उस व्यक्ति को कभी कोई कष्ट दुःख नहीं होगा । आज इन्हीं की पूजा के स्वरूप में मूर्ति एवं फोटो में 95 से 99 प्रतिषत गल्तियां हो गई है । यही मानव मात्र (प्राणीमात्र) के दुःखी होने का मुख्य कारण है ।

पांच देवता चित्र नं. 1 में बताये है (1) इष्ट देवता (2) ग्राम देवता (3) स्थान देवता (4) कुल देवता (5) पितर देवता इनमें एक की भी पूजा के स्वरूप (चित्र या मूर्ती) में गल्ती होने पर पांचो में दोष बन जाता है । आज की स्थिति में तीन देवता जिनके स्वरूप (मूर्ति फोटो) की पूूजा होती है वो 95 से 99 प्रतिषत स्वरूप, प्रमाण के अनुसार गलत स्थापित है एवं हो रहे है यही सर्वत्र दुःख अषान्ति का मुख्य कारण है, सही एवं गलत स्वरूपों का निर्णय करने के सिद्धान्त नीचे बताये जा रहे हे ।

पूजा दो स्वरूपों में की जाती है ।

(1) देवता (पुरूष रूप) (2) देवी (स्त्री स्वरूप)

देवता (पुरूष) का दाहिना (त्पहीज) जीवणा अंग शुद्ध है ($) है सकारात्मक है, पोजेटिव है देवी सम्पदा का है बायां (स्मजि) डावा अंग अषुद्ध है (-) है नेगेटिव है नकारात्म्क है आसुरी सम्पदा का है । इसी तरह देवी (स्त्री) का बायां अंग (स्मजि) शुद्ध है ($) है सकारात्मक है पोजेटिव है देवी सम्पदा का है एवं दायां अंग जीवणा (त्पहीज) अंग अषुद्ध हे नेगेटिव है (-) है नकारात्मक है । आसुरी सम्पदा का है । इसीलिए पुरूष के दाहिने हाथ में रक्षा बन्धन किया जाता है, महिलाओं के बाये हाथ में रक्षा बांधी जाती है एवं यज्ञ, दान, पूजा, अभिषेक, कराने के समय स्त्री पति के दाहिने अंग की तरफ बैठती है ।

प्रमाण – सर्व मंगल कार्येषु पत्नि तिष्ठति दक्षिणः अग्नि पुराण के 34 में अध्याय में भगवान के अस्त्र बायें भाग में एवं 23 वे अध्याय में लक्ष्मीजी भगवान के दाहिनी तरफ विराजमान का प्रमाण लिखा है। चित्र नं 5 विज्ञान एवं गणित के सिद्धान्तानुसार प्रमाण एवं शास्त्रों में वर्णित तथ्यों की सही एवं गलत की पुष्टि इस सिद्धान्तों से होती है ।

देवता देवी गणित का सिद्धान्त
पुरूष रूप स्त्रीरूप
दांया बांया दांया बांया ़ ग् ़ त्र ़
़ . ़ . . ग् . त्र ़

इसी सिद्धान्त के स्वरूप की ही मूर्ति पूजा होती थी एवं होनी चाहिए जिसका फल ($) सकारात्मक होता था सुख शांति रहती थी ।
कल्याणकारी शस्त्र शस्त्र कल्याणकारी
वस्तु वस्तु

आज की स्थिति में जो मंदिरों में, घरों में मूर्ति एवं फोटो स्थापित है एवं बन रही है वो चित्र नं. 6 के अनुसार है एवं पूजी जा रही है जिनका फल (-) नेगेटिव, नकारात्मक होता है नगेटिव की पूजा का फल नगेटिव होता है । आज विष्व में दुःख, अषान्ति, अराजकता, आसुरीवृति का मुख्य कारण यही है जितनी ज्यादा मूर्ति फोटो मंदिरों में घरों में चित्र नं. 6 ग के अनुसार पूजी जावेगी उतनी ही संसार में नाना प्रकार की विपत्तियां प्रतिकूल परिस्थितियां बढेगी अषान्ति बढेगी।
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शास्त्र प्रमाण – नारायण भगवान का ‘‘अग्नि पुराण’’ के 48वें अध्याय में ‘‘षंख पद्म गदा चक्री प्रदक्षिणम्’’ के हिसाब से दाहिने हाथों में शंख पद्म, बांये हाथों में गदा चक्र देना चाहिए जो विज्ञान एवं गणित का सिद्धान्त से प्रमाणित होता है ।
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हनुमान जी का – बायंे भुजा असुर दलमारे दाहिनी भुजा संतजन तारे (आरती),

वामे करे वैरी भयं वहंतं, शैलंचदक्षेनिज कंठ लग्नम (ब्रह्माण्ड पुराण)

वामहस्ते महावृक्षं दसास्यकर खण्डनम्

उद्दद्दक्षिण दोर्दण्डम् हनुमंत विंचितयेत (ब्रह्माण्ड पुराण)

इन सब शास्त्र (पुराणों) एवं गणित के प्रमाण से पता चलता है कि देवता के बायें हाथ में ही शस्त्र होने चाहिए दाहिने हाथ में कल्याणकारी चीजें होनी चाहिए एवं देवी के दाहिने हाथ में शस्त्र एवं बायें हाथ में कल्याणकारी वस्तु होनी चाहिए यही सही है उसकी सत्यता की पुष्टी गणित एवं विज्ञान के प्रमाण से होती है ।
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भारत में रामदरबार की सही मूर्ति सात जगह ही मिली हे जिनमें सीताजी, रामजी के दाहिनी तरफ लक्ष्मणजी रामजी के बांई तरफ है जो गणित एवं विज्ञान के प्रमाण से भी सही है (1) झालरिया मठ डीडवाणा(नागौर)(राजस्थान), (2) श्री बुग्गा मठ तिरूपति (आ.प्र.), (3) नेगनलनूर में 32 फुट के हनुमान जी की मूर्ति के सामने (चेन्नई), (4) धनुषकोटी रामेष्वरम में श्री विभीषण जी के मंदिर पर (5) लक्ष्मीनाथ जी का मंदिर खीचन (जोधपुर) राज. (6) श्री राम मंदिर जाखड़ा बाड़मेर राज. (7) श्री जयसियाराम आश्रम पूनासर (जोधपुर) बाकी सब जगह प्रमाण से विपरीत स्थापित है गणेष जी की भारत में केवल सात मूर्ति ही इस प्रमाण से सही मिली पंचमुखी हनुमानजी की चार मूर्ति सही प्रमाणिक है किन्तु दुर्भाग्य से इन मूर्तियों पर भी तेल सिन्दूर चढ़ाया जाता है चांदी के बरक माली पन्ना (रंगीन कागज) चढ़ाते है तेल, सिन्दुर केवल भैरव, शनि, राहू, केतू पर चढ़ाना चाहिए हनुमानजी, गणेषजी, दुर्गाजी, कार्तीक स्वामी पर केवल गाय का घी सिन्दूर ही चढ़ाना चाहिए एवं घी का दीपक ही जलाना चाहिए ।

सही मूर्तियां, फोटो की पूजा करने पर ही संसार में सुख शांति स्थापित हो सकती है अन्यथा तो असंभव ही है, क्योंकि जब सारी शक्तियां (-) नकारात्मक है तो सुख शांति कैसे होगी विगत हजारों वर्षो से यह भूल हो रही है जो आज की स्थिति में बहुत ज्यादा हो गई है ।

पूर्व काल में षिवाजी महाराज के गुरू समर्थ श्री रामदासजी महाराज ने एवं झालिरिया मठ के महाराजजी एवं अन्य संतो ने सही मूर्तियां स्थापित की थी जो आज मौजूद है श्री संत तुलसीदासजी जैसे महापुरूषों ने शास्त्र सम्मत बात आरती के माध्यम से कही है परन्तु मानव का दुर्भाग्य ही है जो इन प्रमाणिक चीजों को महत्व नहीं देकर गलत मूर्तियों एवं फोटो मंदिरों एवं घरों में लगाये गये है एवं प्रतिदिन गलत ही बनाये जा रहे है जो भविष्य में लगंेगे ।

अतः सभी भक्तों से सादर अनुरोध है कि कृपा करके इन प्रमाणों की सत्यता को समझकर अपने घरों में मंदिरों में जो गलत मूर्ति एवं फोटो स्थापित है उनकी विर्सजन पूजा करके जल प्रवाह करादें एवं सही मूर्ति फोटो की स्थापना करें ताकि आपके घरों परिवारों में राष्ट्र में विष्व में सुख शांति की स्थापना हो सकें, देवी सम्पदा की वृद्धि हो आसुरी सम्पदा खत्म हो सकें ।

चित्र संख्या 5 में देखें जो मूर्ति का प्रमाण लिखा है वे शास्त्र, विज्ञान एवं गणित के प्रमाण से है उसके अनुसार ही मूर्ति व फोटो रखें एवं नीचे लिखे नियमों का अगर सही रूप से पालन करें तो आपकी ज्यादातर समस्याओं का समाधान हो जावेगा, पूर्वकृत कर्मो के अलावा सब समाधान इन नियमों से सम्भव है।
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चांदी का वर्क जो मिठाईयों पर एवं भगवान की मूर्तियां पर श्रृंगार के हेतु लगाये जा रहे है जो अषुद्ध एवं शरीर के लिए हानिकारक है, जिसका लेख राजस्थान पत्रिका के जोधपुर संस्करण में दिनांक 25.09.07 में छपा है एवं श्री कृष्ण जन्त्री (पंचाग) जयपुर से निकलता है इन दोनो में वैज्ञानिक प्रमाण सहित लिखा है कि यह कितना अषुद्ध है एवं इसको खाने से कैंसर पैदा होता है इसलिए चांदी के वर्क का कहीं भी इस्तेमाल नहीं करना चाहिए, कि चांदी के वर्क हकीकत में मेनका गांधी द्वारा लिखे लेख जिसमें लिखा है कि 12,500 पशुओं की हत्या/वध करने पर प्राप्त होने वाली खाल से एक किलो चांदी का वर्क तैयार होता है, ऐसा भारत में तीस टन वर्क 37,50,00000 (सैंतीस करोड़ पचास लाख) अब हमें ही सोचना है कि पशुओं की खाल में उपयोग में किया जाता है ।

ऐसी घृणित वस्तु का देवताओं पर चढ़ाना एवं मिठाई आदि के माध्यम से खाने पर कितनी हानि होती है, इसका एक ओर प्रमाण भी कृष्ण जन्त्री (पंचाग) जोधपुर से प्रकाषित है उसमें भी लिखा है कि यह इतना अषुद्ध है कि इसे खाने से कैंसर जैसी लाइलाज बीमारियां पैदा होती है एवं देवताओं पर लगाने पर मूर्ति अषुद्ध हो जाती है एवं देवताओं पर लगाने पर मूर्ति अषुद्ध हो जाती है इसलिए चांदी के वर्क का कहीं भी प्रयोग नहीं करना चाहिए ।
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कुछ मुख्य बातें जो निम्न लिखित है भक्त ध्यान से प्रयोग करें:-

1. हनुमानजी, गणेषजी, दुर्गाजी, कार्तीक स्वामी की मूर्ति पर केवल गाय का घी व सिन्दूर ही लगाना चाहिए एवं घी का ही दीपक जलावें बाकी देवताओं पर चन्दन केषर, कुंकुंम का तिलक लगावें, तेल सिन्दूर, तेल का दीपक केवल भैरव, शनि, राहू, केतू पर ही इस्तेमाल करें अन्य देवी देवताओं पर नहीं लगावें एवं नाही चांदी के वर्क माली पन्ना लगावें ।

2. मानव का दुर्भाग्य है कि आज के युग में सही तथ्य सामने रखने पर, धर्म प्रचारक व उपदेषक सही तथ्यों को नजर अंदाज कर, यह कहकर अंधकार में धकेल देते है, कि भगवान के कहीं भी अस्त्र-शस्त्र हो सकते है ।

3. देवी की मूर्ति के वाहन सिंह का मुंह बन्द रहना चाहिए, देवी के दाहनी तरफ ही मुख होना चाहिए । देवीयों की मूर्ती में शस्त्र सब दाहिने हाथ में ही होने चाहिए, एवं देवी की मूर्ति (फोटों) पीठ पीछे लगानी चाहिए ।

4. घर के मुख्यद्वार (मेनगेट) पर दो गणेषजी की मूर्तीयां लगानी चाहिए एक का मुंह बाहर की तरफ एक का मुंह अन्दर की तरफ होना चाहिए । गणेषजी की पीठ में दरिद्रता होती है इसलिए पीठ नहीं दिखनी चाहिए, पूजा में अकेले गणेषजी की एक मूर्ती या फोटो होनी चाहिए।

5. घरों में प्रत्येक कमरें के दरवाजें के उपर नौ (9) अंगुल (पौने सात इंच) का स्वस्तिक (साखिया) घी सिन्दूर या केशर चन्दन से अवष्य बना दें ताकि ज्यादातर वास्तुदोष दूर हो जावे ।

6. घर में पूजा में बांस वाली अगरबत्ती नहीं जलानी चाहिए । बांस वंषनाषक होता है, बांस का धुंआ से कई बड़ी बीमारी होती है । बिना बांस का धूप या घी का दीपक ही जलावें ।

7. घर के सभी सदस्य दांतुन या मंजन का ही प्रयोग करें । नील अषुद्ध है (देवी भागवत)

8. घर की पोताई में, कपड़ों में कहीं भी नील (गुली) का प्रयोग न करें ।

9. भगवान की पूजा, व्रत, अनुष्ठान करने वालों को हींग का प्रयोग नहीं करना चाहिए (देवी भागवत)

10. हर रविवार, सूवा, सूतक को छोड़कर एक लोटा जल पितरों के ध्यान से ऊँ विष्णुवै नमः तीन बार बोल कर पीपल में सीचें । जल में थोड़ा कच्चा दूध, कालातिल जो डालना चाहिए ।

11. तुलसी का वृक्ष घर में अवश्य रखें एवं रविवार व अषुद्ध स्थिति में नहीं सीचें ।

12. अपनी कुलदेवी की नित्य पूजा अवश्य करें ।

13. श्राद्ध पक्ष में पितरों का श्राद्ध व तर्पण करना चाहिए एवं अमावस को पितरों के नाम से एक ब्राह्मण या गाय को भोजन अवष्य कराना चाहिए । ग्रहस्थाश्रम में अमावस का बहुत महत्व है।

14. भोजन बनावें तब पहले गाय व कुत्ते की रोटी निकालें एवं घी, शक्कर डालकर पांच ग्रास अग्नि देव को भोग अवष्य लगाना चाहिए । कोई मन्त्र न आवे तो ऊँ या राम का पांच बार उच्चारण करें।

15. महिलाएं मासिक धर्म का पालन अवष्य करें ।

16. घर में धूप-धूपियां या ज्योत लोहे के बर्तन में न करें । पीतल, तांबा या मिट्टी के बर्तन में ही करें (देवी भागवत)

17. हनुमान जी की पूजा करें तो पूंछ की पूजा अवश्य करनी चाहिए पूंछ ही शक्ति का रूप है एवं पूंछ दाहिनी (राईट) तरफ होनी चाहिए ।

18. हनुमानजी की भक्ति करनी हो तो कृपया बजरंग बाण का पाठ नहीं करना चाहिए । बजरंग बाण मंे हनुमान जी को कई बार रामजी व सीताजी की सौगन्ध चढ़ाई गई है । जिससे कारण हनुमानजी को ब्रह्मफांस लग जाती है । राम दुहाई तो मेघनाद या लंका का असुर ही चढ़ा सकता है। भक्त नहीं चढ़ाता हनुमानजी की भक्ति करनी होतो हनुमान चालीसा, हनुमानअष्टक, सुन्दरकाण्ड या विनयपत्रिका में हनुमान स्तुती है । उनका ही पाठ करना चाहिए । किसी कार्य के लिए एक मुखी हनुमत कवच का पाठ कर लेना चाहिए ।

19. परिक्रमा भगवान की मूर्ती के सामने खड़े खड़े प्रदक्षिणात्मक ही करनी चाहिए, मूर्ति के चारों तरफ घूमने से बन्ध लग जाता है ।

ऊपर लिखे नियमों का सही रूप से पालन करने से एवं पूजा की मूर्ति फोटो सही रखकर पूजा करने से ज्यादातर दोष एवं समस्याओं का समाधान स्वतः ही हो जावेगा एवं घर परिवार, राष्ट्र में सुख शान्ति की वृद्धि होगी ।
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अगर विज्ञान एवं गणित का प्रमाण नहीं होता तो सही गलत मूर्तियां का पता ही नहीं चलता कारण शास्त्रों में तो पूर्व काल में काफी उल्ट फेर किये है, विज्ञान व गणित से ही पता चलता है सही/गलत मूर्ति कैसी होती है ।

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नोट:- अगर सही फोटो नहीं मिले तो कृपया हमसे सम्पर्क करें । हम सही शास्त्र व विज्ञान सम्मत फोटो उचित लागत मुल्य पर उपलब्ध करवायेंगे ।

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फोटो सम्पर्क सूत्र- सूरत (गुजरात) 09826119545, बीकानेर 09829282232 इचलकरंजी (महाराष्ट्र) 0230-2438269 मो. 09422047405, रायपुर (छ.गढ़) 09893728383, 09422047405, मुम्बई 022-28043145, नोखामण्डी मो. 09414417154

जय सियाराम सेवा समिति आश्रम
(1) फलोदी, जिला जोधपुर (राज.) पिन-342301 मोबाईल-9414498261, 9414498262, 9352226667, दूरभाष: 02925-222033
(2) पूनासर त. औसियां जिला जोधपुर (राज.) मो. 9214729343, इचलकरंजी (महाराष्ट्र) 0230-2438269,
(3) रायपुर (छ.गढ़) 09893728383, 09422047405, सूरत मो. 09825172175, 9426119545, बीकानेर 9829282232

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